पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी/कृत्रिम बुद्धिमत्ता
संदर्भ
- केंद्रीय गृह मंत्री ने अपराध अन्वेषण में प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया है।
आपराधिक न्याय प्रणाली (CJS) में एआई का उपयोग कैसे किया जा सकता है?
- स्वचालित वाद प्रबंधन: एआई आधारित उपकरणों का उपयोग स्मार्ट शेड्यूलिंग, मामलों की प्राथमिकता निर्धारित करने तथा लंबित मामलों को सक्रिय रूप से कम करने के लिए किया जा रहा है।
- विधिक अनुसंधान एवं दस्तावेजीकरण में एआई: उन्नत एआई-संचालित उपकरण न्यायाधीशों एवं अधिवक्ताओं को विधिक अनुसंधान को सरल बनाने, प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांतों की पहचान करने तथा निर्णयों का सार प्रस्तुत करने में सहायता प्रदान करते हैं।
- उपयोगकर्ता सहायता एवं चैटबॉट्स: एआई आधारित आभासी विधिक सहायक एवं चैटबॉट्स वादकारियों को मामलों की स्थिति संबंधी वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध कराते हैं।
- मामलों के परिणामों के पूर्वानुमान हेतु एआई: एआई मॉडल पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों एवं मामले-संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित परिणामों तथा जोखिम मूल्यांकन के संबंध में पूर्वानुमानात्मक जानकारी प्रदान करते हैं।
- पूर्वानुमानात्मक पुलिसिंग : एआई मॉडल अपराध के पैटर्न, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों तथा अपराधियों के व्यवहार का विश्लेषण कर कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को सक्रिय कदम उठाने में सक्षम बनाते हैं।
- एफआईआर पंजीकरण एवं न्यायिक कार्यवाहियों में एआई: एआई-संचालित स्पीच-टू-टेक्स्ट उपकरण वास्तविक समय में एफआईआर दर्ज करने एवं मामले से संबंधित दस्तावेज तैयार करने में सहायता करते हैं।
- एआई गवाहों की गवाही के विश्लेषण तथा न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों के मूल्यांकन को अधिक प्रभावी बना रहा है।
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एआई का उपयोग
- ई-कोर्ट्स परियोजना: भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक कार्यों के आधुनिकीकरण हेतु डिजिटल नवाचार के माध्यम से प्रारंभ की गई।

- तृतीय चरण के अंतर्गत मामलों के प्रबंधन एवं न्यायालयों की प्रशासनिक दक्षता में सुधार हेतु उन्नत एआई समाधान एकीकृत किए जा रहे हैं।
- विधिक अनुवाद एवं भाषाई सुलभता हेतु एआई: भारत की न्यायिक व्यवस्था मुख्यतः अंग्रेज़ी भाषा में संचालित होती है, जिससे गैर-अंग्रेज़ी भाषी वादकारियों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।
- एआई आधारित विधिक अनुवाद उपकरणों का उपयोग न्यायिक दस्तावेजों एवं निर्णयों को अधिक सुलभ बनाने के लिए किया जा रहा है।
- कानून प्रवर्तन एवं अपराध निवारण में एआई: अपराध की पहचान, निगरानी एवं आपराधिक जांच को सुदृढ़ करने हेतु एआई का उपयोग किया जा रहा है।
- इसके अंतर्गत—
- अपराध स्थल की निगरानी एवं संदिग्धों की पहचान के लिए स्वचालित ड्रोन।
- राष्ट्रीय आपराधिक डेटाबेस से एकीकृत चेहरे की पहचान प्रणाली।
- साक्ष्यों एवं डिजिटल अपराध शृंखलाओं के विश्लेषण हेतु एआई-संचालित फोरेंसिक उपकरण।
- वास्तविक समय में एफआईआर दर्ज करने एवं दस्तावेजीकरण हेतु स्पीच-टू-टेक्स्ट तकनीक।
- गवाहों की गवाही के विश्लेषण एवं न्यायालयीन साक्ष्यों के मूल्यांकन में सुधार।
- इसके अंतर्गत—
- सरकारी पहल: अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली (CCTNS): भारत सरकार द्वारा आपराधिक न्याय प्रणाली में डेटा विश्लेषण एवं अनुसंधान क्षमताओं को सुदृढ़ करने हेतु प्रारंभ की गई पहल।
- इसका उद्देश्य सभी पुलिस थानों को एकीकृत सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म से जोड़कर जांच प्रक्रिया तथा नागरिक सेवाओं में सुधार करना है।
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एआई के उपयोग के पक्ष में तर्क
- लंबित मामलों का बढ़ता भार: भारत की न्यायिक प्रणाली में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिससे समयबद्ध न्याय में जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
- एआई मामलों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित कर लंबित मामलों को कम करने तथा न्यायिक प्रक्रियाओं को तीव्र बनाने में सहायता कर सकता है।
- कारागारों में अत्यधिक भीड़: भारतीय कारागार वर्षों से अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों को समायोजित कर रहे हैं।
- एआई शिकायत पंजीकरण, जांच की निगरानी, आवश्यक कार्रवाई का संकेत देने तथा जांच की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में सहायता कर सकता है।
- परिचालन संबंधी पूर्वानुमान मॉडल: एआई अपराध स्थलों, गश्त मार्गों तथा अपराधियों के संभावित आवागमन मार्गों का विश्लेषण कर पुलिस अभियानों को अधिक प्रभावी बना सकता है।
- संसाधनों का अनुकूलन: एआई प्रशासनिक कार्यों को संभाल सकता है, जिससे पुलिस कर्मियों को जांच, कानून-व्यवस्था बनाए रखने एवं यातायात प्रबंधन जैसे कार्यों के लिए अधिक समय मिल सकेगा।
- सटीकता में वृद्धि: एआई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा को रोक सकता है तथा आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक सूक्ष्म, विश्वसनीय एवं निष्पक्ष बना सकता है।
- लागत-प्रभावी समाधान: न्यायालयों एवं मानव संसाधनों का विस्तार करने की तुलना में एआई एक अधिक व्यवहारिक एवं किफायती समाधान प्रदान करता है।
- इससे अतिरिक्त वित्तीय भार के बिना न्यायालयों की कार्यकुशलता बढ़ाई जा सकती है।
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एआई के उपयोग के विरुद्ध तर्क
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: एआई के उपयोग से अत्यधिक निगरानी तथा व्यक्तिगत निजता के अधिकारों के उल्लंघन का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
- पक्षपात एवं भेदभाव: एआई प्रणालियाँ निर्णय प्रक्रिया में पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे हाशिए पर स्थित समुदायों के साथ अनुचित व्यवहार होने की आशंका रहती है।
- पारदर्शिता का अभाव: एआई एल्गोरिद्म प्रायः अपारदर्शी होते हैं, जिसके कारण निर्णयों के आधार को समझना कठिन हो जाता है।
- इससे जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
- प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता: एआई पर अत्यधिक निर्भरता से आपराधिक न्याय प्रणाली में मानवीय विवेक एवं निर्णय क्षमता का क्षरण हो सकता है।
- डेटा सुरक्षा संबंधी जोखिम: संवेदनशील आपराधिक न्याय संबंधी आंकड़ों के संग्रहण एवं प्रसंस्करण से डेटा उल्लंघन तथा दुरुपयोग की आशंकाएँ बढ़ जाती हैं।
- नैतिक चिंताएँ: दंड निर्धारण एवं पैरोल जैसे संवेदनशील मामलों में एआई का उपयोग निष्पक्षता एवं न्याय से जुड़े नैतिक प्रश्न उत्पन्न करता है।
- खुली न्याय व्यवस्था के सिद्धांतों पर प्रभाव: एआई की अपारदर्शिता खुली न्याय व्यवस्था , विधिसम्मत प्रक्रिया तथा विधि के शासन के सिद्धांतों के विपरीत हो सकती है।
- मानवीय अंतर्दृष्टि का अभाव: एआई उन सूक्ष्म मानवीय परिस्थितियों एवं भावनात्मक पहलुओं की उपेक्षा कर सकता है जिनके मूल्यांकन के लिए मानवीय संवेदनशीलता एवं विवेक आवश्यक है।
आगे की राह
- समर्पित कार्यबल का गठन: सार्वजनिक सेवाओं एवं न्याय प्रशासन में एआई के उपयोग का अध्ययन करने तथा आवश्यक अनुशंसाएँ प्रस्तुत करने हेतु एक समर्पित कार्यबल गठित किया जा सकता है।
- संतुलित दृष्टिकोण अपनाना: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एआई उपकरण गोपनीयता, नागरिक स्वतंत्रताओं एवं नैतिक मानकों का सम्मान करें तथा उनके दुरुपयोग को रोका जा सके।
- सुरक्षित एवं उत्तरदायी एआई का उपयोग: उपयुक्त सुरक्षा उपायों के साथ एआई का उपयोग भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक दक्ष, सुलभ एवं न्यायसंगत बना सकता है।
Source: IE
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